Smart City Bhopal:  अंधों को रोशनी का गुमाँ और भी ख़राब यानि कोनोकार्पस के पेड़

डॉ. सुदेश वाघमारे

भोपाल में स्मार्ट सिटी बनाने का फैसला जब लगभग छह साल पहले हुआ तो ऐसी जगह का चुनाव किया गया जहाँ पेड़ों का घनत्व 5 से भी अधिक था। हजारों रहवासियों और जागरूक नागरिकों ने सड़कों पर आंदोलन किया तब जाकर क्षेत्रीय मंत्री के कान खड़े हुए और अधिकारियों ने स्थान परिवर्तन कर दूसरे स्थान को बर्बाद करने का फैसला लिया। वहाँ की हरियाली और बढ़िया मकानों को तोड़कर बुलेवार्ड स्ट्रीट बनाई गई जिसके आसपास आजकल सड़ी सब्जियों, कुत्तों और बियर की खाली बोतलों तथा दारू के प्लास्टिक के हॉफ और क्वार्टर मुँह चिड़ाते हुए दिख जाते हैं।
तो इस स्मार्ट क्षेत्र में एक ऐसी ज़मीन भी आई जो सरकारी काग़ज़ों में वन दर्ज है और वन विभाग तक को उसका पता नहीं था। वो तो भला हो एक मुख्य सचिव स्तर के साइड ट्रेक किये गए अधिकारी का जिसके आवास के सामने रहने वाले झुग्गी के सभ्य नागरिक असभ्यता दिखाते थे जो उन्हें नागवार गुजरता था। उन झुग्गी वासियों को लतियाने के क्रम में उन्हें पता चला कि यह तो वन भूमि है। इसी वन भूमि के एक हिस्से पर तब तक राज्य पुरातत्व संग्रहालय, एनवीडीए का भवन विंड एंड वेब्स और स्मार्ट रोड निकल कर आकार ले चुका था। बची- खुची करोड़ों की जंगल की ज़मीन को जब हड़पना संभव न दिखा तो स्मार्ट सिटी के कर्णधारों ने यहाँ स्मार्ट वन का खेला खेला। इसी में कोनोकार्पस नाम के पेड़ लगाए गए हैं जिनको लेकर नीचे अख़बार में ख़बर है।
                 भारतेन्दु हरिश्चंद्र का एक नाटक है ‘ अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा’ तो बिजली की लाइन के नीचे ऐसे पेड़ लगाए जाते हैं जो पचास फीट की हाइट तक जाते हैं जिनकी कटी लाशें बिजली विभाग के हिस्से आती हैं। फुटपाथ पर ऐसे पेड़ लगाए जाते हैं जिनकी जड़ें पेविंग ब्लॉक फाड़कर सैकड़ों को रोजगार देती हैं। प्रजाति चयन की वैज्ञानिकता मसूरी के संस्थानों से निकले अहम्मन्य महामानवों को छूकर भी नहीं निकलती जो स्मार्ट सिटी के कर्णधार हैं।
            स्मार्ट सिटी बनने में ग़ज़लगो दुष्यन्त कुमार का मकान भी बुल्डोजर की जद में आ गया था जहाँ उनका संग्रहालय बनाया गया था। उनका यह शेर बरबस याद आ रहा है स्मार्ट सिटी के नंगे नाच को देखकर-
हालाते- जिस्म सूरते-जां और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब ।
रोशन हुए चराग तो आँखें नहीं रहीं
अंधों को रोशनी का गुमाँ और भी ख़राब ।

फेसबुक वाल से साभार

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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