इश्क़, तहज़ीब और तन्हाई की आवाज़: हिंदी भवन में बशीर बद्र को समर्पित होगी 3 अगस्त की शाम

अलीम बजमी
भोपाल |सावन की नरम फिज़ाओं में जब बादल भी ठहरकर सुनते हैं—कुछ अहसासों की सधी हुई सदा, कुछ अशआरों की हल्की खनक—ऐसे ही दिलकश आलम में भोपाल एक अनमोल शख्सियत को याद करेगा। 3 अगस्त की शाम होगी ग़ज़ल के शहंशाह, मोहब्बत और तहज़ीब की रूहानी आवाज़ पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र के नाम।
हिंदी भवन स्थित महादेवी वर्मा सभागार में शाम 4:30 बजे से शुरू होने वाली यह ख़ास महफ़िल अदब का ऐसा गुलशन बनेगी, जिसमें हर फूल बशीर बद्र की शायरी का रंग ओ ख़ुशबू बिखेरेगा। यह आयोजन ‘ख़ुशबू’ संस्था, ‘अंजुमन तरक्क़ी-ए-उर्दू’ और ‘इदारा बाबेइल्म पब्लिकेशन’ के संयुक्त प्रयास से सजने जा रहा है।
पिछले एक दशक से डॉ. बद्र मनोभ्रंश (डिमेंशिया) की हालत में हैं और खुद इस महफ़िल में शरीक नहीं हो सकेंगे, मगर उनका ख़ानदान इस मौके पर मौजूद रहेगा।
इस शाम का एक अहम लम्हा होगा किताब “इस सदी का मक़बूल शायर – बशीर बद्र” का लोकार्पण। दो सत्रों में बंटे इस प्रोग्राम का पहला सत्र डॉ. बद्र की शख़्सियत और उनके लहजे की गहराइयों पर मंथन होगा। सत्र की सदारत मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव करेंगे, जबकि उर्दू अकादमी की निदेशक नुसरत मेहंदी बतौर मेहमान-ए-ख़ुसूसी मौजूद रहेंगी। इस मौके पर डॉ. फारुक बख़्शी, डॉ. ज़की तारिक, शम्स तबरेज़, डॉ. नोमान खां, इक़बाल मसूद, डॉ. अंजुम बाराबंकवी, अशोक मिज़ाज और डॉ. मेहताब आलम जैसे नामवर अदीब अपनी बात रखेंगे। श्रोता उन अशआर की परतों में उतर सकेंगे, जिनमें ज़िंदगी के नर्म-नाज़ुक रेशे छुपे हैं।
दूसरे सत्र में सजेगा एक ख़ास तरही मुशायरा, जिसकी तरही मिसरा होगा:
“रिश्ते होते हैं शायरी की तरह, आंखों में रहा दिल में उतरा…”
मुशायरे की सदारत वरिष्ठ शायर ज़फ़र सहबाई करेंगे और शायर शोएब अली खां अपने दिलकश अंदाज़ में निज़ामत करेंगे। आयोजन के रूह-ए-रवां और शायर साजिद प्रेमी कहते हैं:  “बशीर बद्र सिर्फ़ शायर नहीं, एक ज़माने की आवाज़ हैं। उनकी ग़ज़लें लफ़्ज़ों की नहीं, जज़्बात की तर्जुमानी करती हैं। न उनमें शोर है, न शोरिश—बस एक ख़ामोश तड़प है, जो दिल से दिल तक जाती है।” यह शाम सिर्फ़ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक अहसास होगी—उन लम्हों की, जिनमें बशीर बद्र की शायरी अब भी धड़कती है। जैसे उनका ये अमर शेर आज भी हवाओं में गूंजता है:
“कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो…”

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