अलीम बजमी. भोपाल।
इतना सन्नाटा क्यों है भाई….
बड़े तालाब के आईने में झुकती श्यामला हिल्स की हरियाली के बीच खड़ा भारत भवन कभी सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं था, वह एक तख़य्युल(कल्पना)था-ऐसा ख़्वाब जिसमें फ़न, फ़िक्र और फ़लसफ़ा (ज्ञान या विद्या) एक ही सांस में ज़िंदा रहते थे। 13 फ़रवरी 1982 को जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसे “कलाओं का घर” कहा, तो वह महज़ उद्घाटन नहीं था, वह भारतीय संस्कृति के नाम एक वादा था।
यह वादा चार्ल्स कोरिया की ख़ामोश लेकिन बोलती हुई वास्तुकला में था, चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन की उस जुर्रत (साहस) में था, जो आदिवासी कलाकार को आधुनिकता की मेज़ पर बराबरी की कुर्सी दिलाती है, रंगकर्म निदेशक ब.व. कारंत के रंगमंडल के प्रयोगों में था, जहां लोकधुनें शेक्सपियर से आंख मिलाती थीं, और अशोक वाजपेयी की उस दूरअंदेशी (दूरदर्शिता) में था, जो लोकप्रियता नहीं, साधना को पैमाना मानती थी। भारत भवन में कला का कोई ऊंचा-नीचा दर्जा नहीं था। रूपंकर दीर्घाओं में जब लोक, आदिवासी और आधुनिक चित्र कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते थे, तो वह सिर्फ़ प्रदर्शनी नहीं, एक ऐलान था-कि संवेदना की कोई जात नहीं होती। यही वह सोच थी जिसने आगे चलकर मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय जैसी ऐतिहासिक पहल को जन्म दिया।
रंगमंडल में नाटक मंचित नहीं होते थे, वहां जोखिम लिया जाता था। अनहद में ध्रुपद केवल गाया नहीं जाता था, वह साधा जाता था। वागर्थ में कविता पाठ नहीं होती थी, शब्दों की रूह उघड़ती थी। छवि में सिनेमा देखा नहीं जाता था, समझा जाता था। हर अंग अलग था, मगर आत्मा एक थी-सृजन की आत्मा। लेकिन पिछले दो दशकों में यह आत्मा बार-बार मजलूह (घायल) होती रही। सियासी दख़ल ने उस स्वायत्तता को छील डाला, जो भारत भवन की बुनियाद थी। अब फ़ैसले कला से नहीं, क़ुरबतों (नजदीकी) से तय होने लगे। नियुक्तियां योग्यता की नहीं, नज़दीकियों की पहचान बन गईं। आयोजन बढ़े, मगर उनकी रूह सिकुड़ती चली गई। विचार-स्थल, धीरे-धीरे केवल कार्यक्रम-स्थल बनता गया।
जहां कभी कलाकार को वक़्त और इज़्ज़त मिलती थी, वहां अब वह हाशिये पर खड़ा है। प्रयोगधर्मिता की जगह सुरक्षित सहूलियतों ने ले ली है। जोखिम अब डराता है। भारत भवन-जो कभी सृजन का जोश था,कई बार एक ख़ूबसूरत मगर ख़ामोश सरकारी परिसर सा लगता है, जहां दीवारें बोलना चाहती हैं, पर इजाज़त नहीं।
यह भी सच है कि हर दौर में कुछ विवेकवान आते हैं, जो बिखरती व्यवस्था को थामने की कोशिश करते हैं। उन पलों में भारत भवन फिर सांस लेता है, जैसे कोई पुराना फ़नकार मंच पर लौट आया हो। मगर जब तक इसे सियासी गिरफ़्त से आज़ाद कर फिर से कलाकारों, विचारकों और स्वप्नद्रष्टाओं के हवाले नहीं किया जाता, यह सांस अधूरी ही रहेगी।
भारत भवन आज भी खड़ा है-अपनी स्थापत्य भव्यता, अपने इतिहास और अपनी संभावनाओं के साथ। सवाल यह नहीं कि इमारत बचेगी या नहीं। सवाल यह है कि क्या ख़्वाब बचेगा? क्या यह फिर से “कलाओं का घर” बनेगा, या यादों का एक सजीला स्मारक बनकर रह जाएगा? जवाब दीवारों में नहीं, नीयत में छिपा है। और नीयत अगर फिर से फ़न के सामने सिर झुका ले, तो शायद भारत भवन एक बार फिर बोल उठे।
फेसबुक वाल से साभार
