संपादकीय….
यहां कैसे डाक्टर बनेंगे?

संजय सक्सेना
श्योपुर जिले में तामझाम के साथ खुला नया शासकीय मेडिकल कॉलेज अव्यवस्थाओं का केंद्र बन गया है। न तकनीकी स्टाफ है, न पढ़ाने के लिए विषय विशेषज्ञ शिक्षक। नतीजा यह है कि प्रथम वर्ष के 100 एमबीबीएस छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है। हालात ये हो गए हैं कि हाल ही में हुए एनाटॉमी के सेकंड इंटरनल एग्जाम में पर्याप्त पढ़ाई न होने के कारण अधिकांश छात्र फेल हो गए। इस परिणाम से हताश और व्यथित होकर करीब 70 छात्र कॉलेज छोडक़र अपने घर लौट गए हैं और सोशल मीडिया के जरिए सीधे मुख्यमंत्री से भविष्य बचाने की गुहार लगा रहे हैं।
मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लगातार जिला स्तर पर मेडिकल कालेज खोले जा रहे हैं। कई जगह तो पीपीपी माडल पर इन्हें निजी हाथों में भी सौंपा जा रहा है। लेकिन जो मेडिकल कालेज खुले हैं, उनमें से अधिकांश में सुविधाओं-संसाधनों की भारी कमी है।
आज श्योपुर के मेडिकल कालेज की खबर आई है। इस खबर के अनुसार एमबीबीएस छात्रों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कॉलेज की अव्यवस्थाओं को लेकर अभियान चलाना पड़ रहा है। छात्रों का कहना है कि भवन बनने के बावजूद जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। वे मुख्यमंत्री, चिकित्सा शिक्षा विभाग और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
हाल ही में 100 छात्रों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन में पर्याप्त फैकल्टी, तकनीकी स्टाफ, बिजली-पानी और अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी का आरोप लगाया गया है। छात्रों के अनुसार नियमित कक्षाएं नहीं लग रहीं और विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी से पढ़ाई प्रभावित हो रही है। उनकी पढ़ाई हो ही नहीं पा रही है, जबकि उन पर पैसा लगातार खर्च हो रहा है।
जीएमसी श्योपुर के छात्रों ने एक्स पर मुख्यमंत्री के साथ ही चिकित्सा शिक्षा विभाग और एनएमसी को घेरा। छात्रों का दावा है कि मेडिकल कॉलेज में फैकल्टी के स्वीकृत 118 पदों में से केवल 22 पर नियुक्ति हुई है, जिससे प्रथम वर्ष की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि उनके विभाग की जिम्मेदारी उपमुख्यमंत्री के पास है, लेकिन वो अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभा रहे हैं। उनके पास उनसे चर्चा के लिए भी समय नहीं है।
मेडिकल कॉलेज श्योपुर डीन का इस बारे में जो बयान आया है, उसमें उनका कहना है कि छात्रों के सामने फेकल्टी और तकनीकी सपोर्टिग अभाव की पोस्टिंग का तो इश्यू था ही, साथ ही बिजली नहीं आने का भी मुद्दा था। आरओ वाटर नहीं होने जैसी चुनौतियां भी थी। हमने डीएमई को इस संबंध में बताया है। पद भरने के लिए वैकेंसी निकाली गई हैं, जल्द समाधान होगा।
लेकिन यहां बड़ा सवाल तो यह उठता है कि बिना पर्याप्त फैकल्टी और अन्य जरूरी सुविधाओं के मेडिकल कालेज शुरू कैसे कर दिया गया? क्या केवल राजनीति के लिए, अपनी उपलब्धियों में शामिल करने के लिए मेडिकल कालेज खोला गया? क्या इस राजनीति के चलते सैकड़ों छात्रों का भविष्य खराब नहीं हो रहा है?
यह मामला केवल एक मेडिकल कालेज का नहीं है। हमारे यहां हर चीज की लहर सी आती है। पहले इंजीनियरिंग और एमबीए वाले कालेज खोलने का फैशन चला था। दर्जनों बंद हो चुके हैं। हजारों इंजीनियर और एमबीए डिग्री धारी बेरोजगार घूम रहे हैं। पांच से दस हजार के बीच की प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं, कई को तो वह भी नहीं मिल पा रही है। अब फैशन चला है मेडिकल कालेज खोलने का।
इसे फैशन या लहर नहीं कहना चाहिए, क्योंकि हमारे देश में चिकित्सकों की आज भी भारी कमी है। मुद्दा यह है कि जब हम सुविधाएं पर्याप्त नहीं दे पा रहे हैं तो क्यों इस तरह के कालेज खोल रहे हैं। पहले जितने कालेज नहीं थे, आज उतने विश्वविद्यालय हो गए हैं। इनमें निजी विवि की संख्या काफी है। यही हालत मेडिकल कालेज की हो रही है। पढऩे वाले तो आ गए, पढ़ाने वाले नदारद हैं। जब पढ़ेंगे नहीं तो फेल होना स्वाभाविक है। चार साल की पढ़ाई के बाद कैसे मेडिकल छात्र निकलेंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
भाषणों में आंकड़े बता कर वाहवाही लूटने के लिए और भी मुद्दे मिल जाएंगे, कम से कम उस क्षेत्र को तो छोड़ दें, जो लाखों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। मेडिकल की सुविधा के लिए सरकार प्रयास कर रही है, तो इसमें कम से कम सरकार की हंसी तो नहीं उडऩी चाहिए। यदि दो मेडिकल कालेज में सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं तो चार खोलने की जरूरत नहीं। एक कालेज में पर्याप्त सुविधाएं हो जाएं, फिर दूसरा शुरू करना चाहिए। डाक्टरों की संख्या बढ़ाने के बजाय बेहतर चिकित्सक बनाने का काम होना चाहिए।
सरकार इस मामले में गलत है, यह नहीं कहना चाहिए, लेकिन पहले सुविधाएं उपलब्ध कराएं, फिर कालेज शुरू करें, यह प्रक्रिया तय होना चाहिए। इसमें श्रेय की राजनीति नहीं होना चाहिए। यहां एक उदाहरण और देना जरूरी है। हम एआई की बात बहुत करते हैं, उसके भी इंजीनियरिंग कालेजों में कोर्स शुरू तो कर दिए हैं, लेकिन पढ़ाने वालों की संख्या गिनती में ही है। ऐसे में जो बच्चे एआई की डिग्री लेकर बाहर निकल रहे हैं, उन्हें इसकी प्राइमरी जानकारी तक पर्याप्त नहीं होती। यही चीज हम मेडिकल  में कर रहे हैं। आखिर क्यों?

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